Saturday, 8 December 2012

कविता


चालाकविता

वर्ष काल ा,उस दिन
सो रही थी सारी दुनिया,
तब कहीं से आयी सुबह
ग्यास लेके टॉकर लॉरी ।

झट से उलट गयी वह
चाला की डिवैडर को टकराकर ,
बम – सा टूट गयी टॉकर
उड़ गयी आग दसों दिसा में ,
जो उठे आवाज़ सुनकर
दौड गये वे घरों से बाहर ,
लेकिन क्षण भर-सा
प्राण उनका
जा गिरते रहे वे,
पतंग सा आग में
जो बचे आग से -
उन्हें रहना पड़ा, अस्पताल में
फफोला उठके रो-रोकर
उनमें थे पशु और पक्षी भी
जो आया चाला पर ।
हाय ! न थी चीज़ें कोई
उनके हाथों में आग बुझाने की
पर थी कैमरा तरह-तरह की ,
जो आये चाला का रुदन
अपना मानकर
पर न थे उनमें
सान्त्वना देने की भाषा उन्हें ।
और एक रुदन सुनने की ताकत
किसी में नहीं ,
फिर भी आएँगी कहीं से ज़रूर
काल-भैंसा की तरह टॉकर ।
सुनेंगे हम दहाड़
असहाय-निसहाय लोगों की।
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बाबुराज.के.पी
हिंदी अध्यापक
कुञ्ञालि मरय्कार हायर सेक्कन्टरी स्कूल,
कोट्टक्कल, वटकरा


2 comments:

  1. ബാബുരാജിന്,
    താങ്കളുടെ ചാല എന്ന കവിത പ്രസിദ്ധീകരിച്ചതിലൂടെ ദേവധാര്‍ ഹിന്ദിവേദി അഭിമാനിക്കുന്നു. ആശംസകള്‍

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