Friday, 11 May 2012


कन्नूर से रवीजी:-

                   नदी और साबुन ' कविता का शेष अंश '

          'नदी और साबुन' का आशय स्पष्ट होने के लिए कविता का शेष अंश का भी पढ़ना अनिवार्य है।
नदी और साबुन ' कविता का शेष अंश 
  एक नीली साबुन-बट्टी
          वह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का 
   बहुप्रचलित साबुन है। 
      दुखियारी महतारी है गंगा 
         उसका जी काँपता है डर से 
                 उसकी प्रतिद्वंद्वी हथेली-भर की वह 
      जो साबुन की टिकिया है 
              इजारेदार पूँजीवाद की बिटिया है 
                   उसका बलाबली झाग उठने से पहले 
            गंगा के दिल में हौल उठता है। 
 (महतारी : माँ, महाबली : अत्यंत बली, बट्टी : छोटी गोल लोटिया-टिकिया, इजारे दार : ठेकेदार, हौल : डर,भय)
  

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