Thursday, 26 May 2011

प्रकृति से प्रेम करें...............

कफन

कविता

बुनता है कफन आज का मानव,

मरते रहे प्रकृति-माँ को ओढ़ाने,

पी चुका दूध इस धरती के थन से

अब पी रहा है निण भी उसका।

पंजर बनाकर छोडेंगे उसे

लूटकर उसके सारा रस,

क्यों करता यह निष्ठूर काम

इतनी करुणामयी प्रकृति की ओर।

काट दिए सारे पेड़ जो देते छाया

इस करुणामयी प्रकृति माँ को।

लूट लिया सारा शुद्ध जल भी,

जो देती शीतलता इस मिट्टी को।

मलिन कर दिया वायु को भी

घुसाकर उसमें धुआँ और धूल।

नष्ट किया मन की शांति भी

कर्ण कठोर शोर और कोलाहल से।

हे प्रकृति माँ क्या, खो गया तुम्हारा

वह स्वच्छ सुन्दर ओजपूर्ण यौवन

बना दिया वे, तुम्हें वृद्धा और रोगी

फिर नहीं मन में आर्द्रता और दया तेरी ओर।

आज बुना रहा है कफन आज का मानव

मरणासन्न तुम्हें पहनाने.....

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मारगरट.पी.

जी एच एस एस-निऱमरुतूर

मलप्पुरम जिला

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